Thursday, 24 December 2015

Ideal Assembly/Parliament - By Prof. Sudhakar Dixit/ President Awardee

प्रोफेसर सुधाकर दीक्षित/ संरक्षक
      राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त


आदर्श सभा
किसी भी प्रकार के विचार विमर्श के लिए सभा का आयोजन सदा से चला आ रहा है।  सभी लोग एक मत से यह स्वीकार करते हैं कि अंतिम निर्णय पर पहुँचने  के लिए सभा सबसे उत्तम माध्यम है।  आज लोकतंत्र  में भी इसका महत्व सबसे ऊपर है।   इसीलिए लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधानपरिषद  आदि का वर्तमान में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है।
ऐसा क्यों है?  क्योंकि सभा एक आदर्श विशिष्ट  महानुभावों के समूह रूप में मान्य है।  महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में सभा का स्वरूप ऐसा बताया है -
                                 "न सा सभा यत्र  सन्ति वृद्धाः
                                  वृद्धा न ते येन वदन्ति धर्मम।
                                  धर्मः स नो यत्र  सत्यमस्ति ,
                                  सत्यम न तत यचछलमभ्युपैति। "
                                                                                          (५/३५/५८ )


इस का अर्थ यह है -
 वह सभा नहीं है जिसमे वृद्ध न हों, वे वृद्ध नहीं हैं जो धर्म के अनुसार न बोलें, वह धर्म नहीं हैं जो सत्य से परिपूर्ण न हो, वह सत्य नहीं है जिसमें छल  हो।
महाभारत का यह श्लोक संसदभवन की लिफ्ट संख्या १ के समीप में विद्यमान गुम्बद पर उल्लिखित है।        इससे यह स्पष्ट है कि वे अपनी उपस्थिति से सभा के आदर्शरूप को ही उजागर करें ; अन्यथा उपस्थित ही न हों।  इस दृष्टि से दृढ़  प्रतिज्ञा के साथ ही माननीय लोगों को केंद्रीय तथा प्रदेशीय मान्य सभाओं  में उपस्थित होना चाहिए।
    मेरा तो विनम्र निवेदन है -
जब भी कोई सभा आयोजित हो तो प्रारम्भ में अभी ऊपर उद्धृत महाभारत के श्लोक को अनुवाद के साथ अवश्य पढ़कर सभी सदस्यों को सुनाया जाय जिससे एक आदर्श भाव के साथ ही अपने उत्तरदायित्व  का निर्वाह माननीय  सदस्य करें।
      यदि ऐसा हो तो संभवतः आज कल जैसा सभाओं में देखा जा रहा है वह रूक जाय या कम हो सके।
ऐसा होने से देशवासियों को बड़ी राहत मिल सकती है।  साथ ही देश का भविष्य भी उचित निर्णय के साथ सुखद हो सकता है।

               

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