कुसूर
कैसा हमसे हुआ ?
कुसूर
कैसा हमसे हुआ ?
बेपनाह मोहब्बत उनसे हुई ,
वक़्त रहते न इज़हार हुआ ,
परिंदे वक़्त पर इज़हार - ऐ - हक़ ना रहा।
कश्मकश में बीत गए ,
कई रातें और कई दिन,
क्या उनको भी हमसे ?
बेपनाह ना सही,
मोहब्बत है ?
जवाब का उनके,
दिल ने चाहा इंतज़ार करें।
पर, कुसूर कैसा हमसे हुआ?
न इंतज़ार हुआ और,
ना ही इज़हार हुआ।
क़रीब, वो आये तो बहुत,
लफ्जों के फूल बिखेरे तो बहुत,
पर अफ़सोस,
न तरसी आँखों को ठंडक मिली,
और ना ही तरसे दिल को सुकून मिला।
कुसूर कैसा हमसे हुआ ?
बेपनाह मोहब्बत उनसे हुई ,
वक़्त रहते न इज़हार हुआ ,
परिंदे वक़्त पर इज़हार - ऐ - हक़ ना रहा ।
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